झोकरकर ने गायन की शुरुआत राग पुरिया धनाश्री से की

एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा सुश्री कल्पना एवं अनुजा झोंकरकर, इंदौर द्वारा स्वर सरिता विषय एकाग्र व्याख्यान एवं गायन की प्रस्तुति दी गई | प्रस्तुति की शुरुआत सुश्री झोकरकर के व्याख्यान से हुई जिसमे उन्होंने कहा कि संगीत में शास्त्रीय, उपशास्त्रीय एवं सुगम संगीत यह तीनों विधाएं बहुत लोकप्रिय और प्रचलित हैं |

नाद ब्रम्ह से संगीत श्रृष्टि का निर्माण हुआ है, सुरों का अपना महत्व होता है, सुर ही संगीत का प्राण है आत्मा है इसलिए सुरीला संगीत हमेशा लोकप्रिय होता है और सुना जाता है| कहते हैं कि हमारे संगीत की शुरुआत लोक संगीत से हुई है, लोग कहते हैं कि संगीत के चार सुरों से संगीत श्रृष्टि का निर्माण हुआ है| शास्त्रीय संगीत की विधाओं में पहले प्रबंध गायन गाया जाता है उसके बाद ध्रुपद, धमार, अष्टपदी, तराना और उसके बाद खयाल गायन की परम्परा शुरू हुई और अभी तक जारी है| ध्रुपद को भी आजकल बहुत महत्व दिया जा रहा है और यह प्राचीन कला पुनः जीवित हो उठी है…, संगीत की अन्य विधाओं पर चर्चा करते हुए सुश्री झोकरकर ने गायन की शुरुआत राग पुरिया धनाश्री से- विलंबित खयाल एक ताल में ‘मेरो करतार’ से की पश्चात द्रुत बंदिश एक ताल में ‘देखी तेरी आन बान’, ठुमरी- ‘आज मोरी कलाई मुरक गई’, टप्पा- राग खमाज में ‘लाल पेजानी बेल, चाल पहचानी कियां’, तीन ताल में ताराना- ‘दानी दिन तना ना’, दादरा- क्या जादू डारा, दिवाना किये श्याम’ और  ‘मन लागो यार मेरो फकीरी में’ भजन से अपनी प्रस्तुति को विराम दिया |  

सुश्री झोकरकर ने संगीत की शिक्षा अल्प आयु से ही अपने पिता एवं पंडित कृष्ण राव मजूमदार से लेना आरम्भ कर दिया था| आपने देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुति दी है, आप आकाशवाणी की टॉप ग्रेड कलाकार हैं| आपको कई सम्मान प्राप्त हैं|  

मंच पर- सह्गायन में सुश्री अनुजा झोकरकर, तबले पर श्री रामेन्द्र सिंह सोलंकी, हारमोनियम पर श्री उपकार गोडबोले ने संगत दी |  

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