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झनझन देवी ही है शैलपुत्री का शक्ति स्वरूप
बुंदेलखण्ड में नवरात्रि के शक्ति पर्व पर वैदिक उपासना की परम्परा लम्बे समय से रही है। महाराज छत्रसाल की नगरी के उत्तरी छोर पर मां दुर्गा के पहले स्वरूप यानी शैलपुत्री का स्थापना मां झनझन देवी के रूप में है। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 86 पर छतरपुर से 4 किलोमीटर पहुंच कर पश्चिम की ओर 2 किलोमीटर जाना पडता है। दुर्गम इलाके में त्रिकूट पर्वत पर मां विराजमान हैं। जनप्रतिनिधियों तथा शासन-प्रशासन की घोर उपेक्षा के कारण यहां पर आधारभूत सुविधाओं का नितांत अभाव है। जंगल के मध्य से गुजरने वाला कटीला मार्ग आज कष्टसाध्य यात्रा का जीता जागता उदाहरण बना हुआ है।
पर्वतराज हिमालय की पुत्री की उपासना को समर्पित शक्ति पर्व का प्रथम दिवस मानवीय काया की कुण्डलनी शक्ति के जागरण का शुभारम्भ है। मूलाधार चक्र पर मां शैल पुत्री की तरंगमयी ऊर्जा को केन्द्रित करने का विधान है ताकि स्वयं सिध्दि का योग बन सके।
त्रिकूट पर्वत पर विराजमान मां के इस स्वरूप को अनेक बार नूपुरों के संगीत के रूप में सुना गया। झनझन की अलौकिक ध्वनि की अनुभूतियों ने इस स्थान को ग्रामीण क्षेत्र में मां झनझन देवी के नाम से विख्यात कर दिया। बुंदेलखण्ड के दूरदराज के श्रध्दालुओं की नवरात्रि साधना का शुभारम्भ इसी स्थान से होता है। मां के दरबार के ठीक सामने महाबली हनुमान की स्थापना है। इस विग्रह के पीछे की ओर सिध्द क्षेत्र का विशाल विस्तार है जहां अनेक साधकों की समाधियां वर्तमान में भी तपीय ऊर्जा का संचार करतीं है।
मानसिक एकाग्रता के साथ इस स्थान की जाने वाली साधना निर्जन वातावरण, पर्वतीय क्षेत्र और सिध्दों की कर्म भूमि होने के कारण तत्काल फलीभूत होती है। तो आइये चलें महाराज छत्रसाल के नगरी के समीप स्थापित नौदेवी की पावन परिक्रमा पर और पहले दिवस करें शैलपुत्री के स्वरूप की पूजा-अर्चना हेतु।




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