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जनजातीय संग्रहालय में दिखी कालबेलिया समुदाय की मान्यता और पंरपरा
भारत अपनी विविध संस्कृति और परंपरा के लिये विश्व भर में जाना जाता है। विभिन्न ऋतुओं का इस देश में शिष्टाचार, आदर-भाव, संवाद, धार्मिक संस्कार, मान्यताओं और परम्पराओं के लिए स्थान है। यहाँ अपने-अपने धर्म के अनुसार लोग मान्यताओं, रीति-रिवाज़ और परम्परा को मानते हैं और रस्मों के हिसाब से गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं, लज़ीज़ पकवान खाते हैं, रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं। कुछ इसी तरह की मान्यताओं और परम्पराओं को इन दिनों जनजातीय संग्रहालय में सहेजा जा रहा है, जहाँ 10 दिवसीय निस्पन्द शिविर में कालबेलिया समुदाय अपनी मान्यताएँ और परम्पराओं को दर्शकों के बीच प्रस्तुत कर रहे हैं। एक ओर जहाँ गुदड़ी बनाकर हस्तकौशल दिखा रहे हैं तो दूसरी ओर सुरमा बनाने की तकनीक बताई जा रही है। ऐसी ही कई मान्यताएँ इन कालबेलिया समुदाय में देखने को मिलती हैं। आज 1 सितंबर 2021 को समुदाय द्वारा पशुओं और मनुष्यों के संबंध को उजागर करने परम्परा से चली आ रही गधे की बारात के दृश्य-बिम्ब को संग्रहालय में रचा गया।
यह गतिविधि समुदाय द्वारा अपना डेरा एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के समय की जाती है। इस बारे में हरियाणा, नारनौल के अध्येता अश्वनी शर्मा ने बताया कि कालबेलियों समुदाय का अपने पालतू जानवरों से अन्तर सम्बन्ध बहुत गहराई से जुड़ा है। उनके लिए अपने पशु महज उत्पादक गतिविधि के उपकरण मात्र नहीं हैं। कालबेलिया का पालतू जानवर गधा, जिसके ऊपर वे अपना डेरा लादते हैं। जो उनके सम्पूर्ण घुमंतू जीवन का केंद्र बिन्दु है। वे लोग अपने पालतू जानवर गधे की शादी कराते हैं। वे उस शादी में बारात लेकर जाते हैं। गधे के सर पर पंख बांधते हैं जिसे मौर बोला जाता है। यह साफे की तरह होता है। कालबेलिया महिलाएं नाचती-गाती हुई पीछे-पीछे चलती हैं। इस शादी में 12 घुमंतू जाति के लोग एकत्रित होते हैं और यह शादी उस दिन की जाती है जिस दिन डेरा उठाते हैं।




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