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गोंड जनजातीय ‘बाना वादन-गायन’ की प्रस्तुति
एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा सरस कथा प्रवक्ता श्री गुरुप्रसन्न्दास और साथी, खजूरीताल(सतना) ने ‘भक्ति संगीत’ एवं श्री धरमसिंह बरकड़े और साथी, डिंडोरी ने गोंड जनजातीय ‘बाना वादन-गायन’ की प्रस्तुति दी |
प्रस्तुति की शुरुआत श्री गुरुप्रसन्न्दास एवं साथियों द्वारा भक्ति संगीत से हुई, जिसमें सर्व प्रथम गणेश वंदना पश्चात् श्रीराम चरितमानस की चौपाईयाँ एवं जग में सत्संग विना प्राणी, सदगति मति पाना क्या जाने, मुझसे अधम- अधीन उद्मारे न जायेंगे, चाकर राखो जी श्याम, बिन देखे नयनवा ना मानें, न यूँ घनश्याम तुमको और आवा हो जग नाव खिवैया आदि भजन प्रस्तुत किये|
श्रीगुरुप्रसन्न्दास जी ने लगभग ग्यारह वर्ष की आयु से महंत श्री रामभूषण दास से गृहस्त जीवन का परित्याग कर विरक्त संत की दीक्षा ग्रहण की एवं संस्कृत में आचार्य तक की शिक्षा प्राप्त की| आप लगभग पैंतीस वर्षों से रामकथा, भागवत कथा वाचन एवं अन्तराष्ट्रीय स्तर पर रामलीला मंचन करते आ रहे हैं |
प्रस्तुति में तबले पर श्री नागेन्द्र पाण्डे एवं श्री घनश्याम, वायलिन पर- श्री योगेश पाण्डे, कीबोर्ड पर- श्री विवेक तिवारी और मंजीरे पर- श्री रत्नेश तिवारी ने संगत दी|
दूसरी प्रस्तुति श्री धरमसिंह बरकड़े और साथी, डिंडोरी द्वारा गोंड जनजातीय आख्यान से राजा हीरा खान पर केन्द्रित गाथा को पारंपरिक वाद्य यन्त्र बाना के माध्यम से गाकर प्रस्तुत किया गया| बाना वादन और गायन में श्री जेहर सिंह तिलगाम ने श्री बरकड़े के साथ संगत दी|
मध्यप्रदेश की गोंड जनजाति के गाथात्मक इतिहास चेतना और रूप को सदियों से गोंडवानी के रूप में सुरक्षित रखा है| इसमें परधान गायक गोंड यजमानों, अपने देवताओं और चरित नायकों का यश-गाथा गाकर सुनाते आ रहे हैं| अपनी जीविका चलाने के साथ ही अपनी स्मृति को सुरक्षित रखने और पीढ़ियों में हस्तांतरित करने की भूमिका भी जनजातीय आख्यान के माध्यम से ये गायक-वादक निभाते आ रहा हैं|




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