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गीतों पर नृत्य प्रस्तुति
एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज सिन्धी साहित्य अकादमी द्वारा प्रो. अशोक मनवानी, भोपाल का कला एवं संस्कृति पर एकाग्र ‘व्याख्यान’ एवं सतीश तेजवानी और साथी, भोपाल द्वारा ‘नृत्य’ प्रस्तुति दी गई |
प्रस्तुति की शुरुआत मनवानी के व्याख्यान से हुई, जिसमे उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति काफी समृद्ध और लोक परंपराओं से समृद्ध है। देश के विभाजन के कारण कुछ लोक कलाएं अब प्रचलन में अधिक भले न हों लेकिन इसमें समय की सुरभि महसूस की जा सकती है। लोक नृत्य ‘छेज’ के रूप में एक महत्वपूर्ण धरोहर समुदाय के अस्तित्व के साथ अपनी विकास यात्रा कर रही है । यह ऐसी प्रदर्शनकारी कला है जो भगत के साथ काफी लोकप्रिय हुई । भगत जहां छत्तीसगढ़ की पंडवानी और कर्नाटक के यक्ष गान की तरह लोक गाथा गायन हैं वहीं यह गुजरात के गरबा नृत्य से मेल खाती हुई कला है । फर्क इतना है के छेज में गति अधिक होती है। कलाएं मनुष्य के आमोद प्रमोद का महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं…। भारतीय सनातन परंपरा का निर्वाह करते हुए समुदाय को देश की स्वतंत्रता के पश्चात परिस्थितियां निर्मित होने पर मातृ भूमि का त्याग करना पड़ा। आर्थिक रूप से शून्य हो जाने के बाद अपनी विनम्रता, कार्यकुशलता और परिश्रम भावना से पुन: स्थापित होकर दिखाने वाले इस समुदाय का राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। श्री मनवानी ने समाज के और कई पहलुओं पर भी प्रकाश डाला|
श्री मनवानी रंगकर्म से जुड़े हैं, आपने लगभग तीस नाटकों में अभिनय और सात नाटकों का लेखन किया है- चक्की चालु है, रक्त दोष, दम मारो दम, लड़की पढ़कर क्या करेगी, पहला बाराती, बिन मूंगफली मैच अधूरा और समधी का टिफिन | आपकी कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं जिनमे पाँच सिंघी भाषा में और दो हिंदी भाषा में प्रकाशित हुई हैं, आप लगभग पच्चीस व्यंग्य और लगभग दो हजार आलेख, आठ स्मारिकाओं और दो साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन कर चुके हैं | आपको मानव संसाधन विकास मंत्रालय से नाट्य संग्रह ‘रक्त दोष’ के लिए पुरस्कार एवं अन्य संस्थाओं से लगभग बीस पुरस्कार प्राप्त हैं |
अगली प्रस्तुति श्री सतीश तेजवानी और साथियों द्वारा नृत्य की हुई – जिसमें अज खुशियु न जो डीह आयो आ, मुहिंजी धरती मुहिंजो चमन ऐं टोपी अजरक वारा जियन, मूहिंजो झूलन तो चमके, ऐं हथ मथे करे.. आदि गीतों पर नृत्य प्रस्तुति दी गई|




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