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‘गीता संपूर्ण विश्व के लिए उपयोगी ग्रंथ’- सांची विवि में संगोष्ठी
सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में “भगवद्गीता के परिप्रेक्ष्य में ज्ञानयोग एवं कर्मयोग का अनुशीलन ” विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी संपन्न हुई। विश्वविद्यालय के कुलपति एवं म.प्र शासन संस्कृति विभाग तथा जनसंपर्क विभाग के प्रमुख सचिव श्री शिव शेखर शुक्ला ने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि गीता, उपनिषद तथा रामचरितमानस जैसे ग्रंथों को आमजन तक पहुंचाने की आवश्यकता है। शुक्ला के मुताबिक इन ग्रंथों को इतना अधिक व्यापक किया जाना चाहिए कि युवा पीढ़ी इनसे जुड़कर अपना कल्याण कर सके।
श्री शिव शेखर शुक्ला का कहना था कि गीता, भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए उपयोगी है क्योंकि यह व्यक्ति की पात्रता के अनुसार ज्ञान, कर्म, भक्ति और ज्ञान योग का रास्ता बताती है। उनका कहना था कि गीता में वर्णित ‘ज्ञान’ एवं ‘कर्म’ योग के मार्गों में से कोई भी बड़ा या छोटा नहीं है और जीवन के विभिन्न पड़ावों जैसे -बाल अवस्था, युवा अवस्था, प्रौढ़ अवस्था इत्यादि में अपने ज्ञान एवं अनुभव के अनुसार व्यक्ति इन योगों को प्राप्त करता है।
सांची विश्वविद्यालय के भारतीय दर्शन विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता और छ्त्तीसगढ़ – अंबिकापुर के श्रीरामकृष्ण विवेकानंद सेवा आश्रम के सचिव स्वामी तन्मयानंदजी ने कहा कि ‘ज्ञान योग ही विचार मार्ग है’ और ज्ञानी व्यक्ति समस्त कामनाओं का त्याग कर आत्मा में रमता है तथा ऐसे आत्मलीन ज्ञानी ही शांति को प्राप्त करते हैं।
कोलकाता स्थित रामकृष्ण मिशन, बेलूर मठ के स्वामी यज्ञधरानंदजी ने गीता में उल्लेखित ‘कर्मयोग’ पर केंद्रित अपने व्याख्यान में बताया कि ईश्वर के प्रति समस्त कर्मों को अर्पित करके किया जाने वाला कर्म ही कर्मयोग है। उनका कहना था कि ईश्वर अर्पण बुद्धि से ही कर्मों में पूर्णता आती है तथा व्यक्ति अपने साधारण कर्मों के माध्यम से ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है….ईश्वर का स्मरण करते हुए कर्मों को करने से कर्मों में पूर्णता प्राप्त होती है।
ऑनलाइन संगोष्ठी के संयोजक और सांची विश्वविद्यालय के भारतीय दर्शन विभाग के प्रमुख डॉ नवीन दीक्षित ने कहा कि योग दरअसल आत्मा का परमात्मा से मिलन है और गीता के अनुसार यह जुड़ाव ज्ञान, कर्म एवं भक्ति के द्वारा हो सकता है।




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