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‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत ‘बघेली गायन’ और ‘अहिराई लोकनृत्य’ की प्रस्तुति
एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा सुश्री अर्चना पाण्डे एवं साथी, रीवा का ‘बघेली गायन’ और प्रजीत कुमार साकेत एवं साथी, सीधी द्वारा ‘अहिराई लोकनृत्य’ की प्रस्तुति हुई |
प्रस्तुति की शुरुआत सुश्री पाण्डेय ने गणेश वंदना से की, उसके पश्चात सोहर, नचन हाई, मंडप छावन, पूड़ी बेलन हाई, सुहाग, बिदाई, परछन, दादरा और होलीगीत आदि विवाह संस्कार गीतों की प्रस्तुति दी | प्रस्तुति में कोरस में- सुश्री खुशी पाण्डेय एवं रागिनी दुबेदी, तबले पर- श्री राजेश शर्मा, ढोलक पर- श्री दुष्यंत शर्मा और खंझनी पर- श्री वैभव पाण्डेय ने संगत दी |
सुश्री अर्चना पाण्डेय बचपन से ही बघेली लोकगायन करती आ रही हैं, आपने संगीत की शिक्षा अपनी माँ सुश्री मंगला मिश्रा से ग्रहण की, आप आकाशवाणी एवं दूरदर्शन की कलाकार हैं, आप देश की विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी प्रस्तुति दे चुकी हैं
दूसरी प्रस्तुति श्री प्रजीत कुमार साकेत एवं साथी, सीधी द्वारा ‘अहिराई लोकनृत्य’ की हुई –
अहिराई नृत्य–
बघेलखण्ड में निवास करने वाले अहीर समुदाय द्वारा किये जाने वाले जातिगत है| इस नृत्य में बिरहा गायन के साथ महिला और पुरुष दोनों समवेत रूप से नृत्य करते हैं| यह नृत्य यादव जाति की सांस्कृतिक पहचान है| विशेष रूप से शादी व्याह के अवसर पर महिला-पुरुष द्वारा इस नृत्य को प्रतिश्पर्धा रूप में किया जाता है| यह प्रदर्शन दरअसल लड़का-लड़की को अपने लिए सही जीवन साथी चुनने की आजादी देता है|
इस नृत्य में नगड़िया व शहनाई वाद्ययंत्र का उपयोग किया जाता है, महिलाएँ: कछनीदार धोती, बिछिया और करधन आदि आभूषण पहनती हैं तो पुरुष: जामाजोरा, डोर-चौरासी और साफा पहन कर नृत्य करते हैं|
प्रस्तुति में- राजमान साहू, राजू यादव, रामधनी मौर्य, लक्ष्मी साकेत, मधुकर, ददई, छठीलाल, नर्मदा, रम्मर साकेत, बुत्टन साकेत, गीता साकेत, सुनीता एवं शिवकरण यादव संगत ने संगत दी |




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