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कूनो में चीतों के बाद शिवपुरी में टाइगर विस्थापन, बांधवगढ़-पन्ना के बाघ बढ़ाएंगे कुनबा
माधव नेशनल पार्क शिवपुरी में 50 साल बाद टाइगरों की बसाहट फिर शुरू होने जा रही है। यहां 10 मार्च को बांधवगढ़ और पन्ना नेशनल पार्कों के टाइगरों को माधव नेशनल पार्क विस्थापित कर वहां बाघों का कुनबा बढ़ाने के लिए छोड़ा जा रहा है। ग्वालियर-चंबल में वाइल्ड लाइफ टूरिज्म की दिशा में पालपुर कूनो के बाद दूसरा बड़ा कदम उठाया जा रहा है।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर संभाग में माधव नेशनल पार्क में टाइगरों की बसाहट शुरू की जा रही है। यहां 1970 में आखिरी बार टाइगर देखा गया था और इसके बाद से माधव नेशनल पार्क में बाघ नहीं हैं। ग्वालियर के सिंधिया राजघराने के माधवराव सिंधिया के नाम पर यह नेशनल पार्क है जिसे 1956 में शिवपुरी नेशनल पार्क के नाम से पहचाना जाता था। यहां टाइगर धीरे-धीरे खत्म हो गए थे और 1970 में एक भी टाइगर नहीं बचा था।
सिंधिया के प्रयास से टाइगर से फिर आबाद होगा माधव नेशनल पार्क
सू्त्रों के अनुसार केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रयासों से ग्वालियर संभाग के इस नेशनल पार्क में टाइगरों की फिर बसाहट के प्रयास सफल हुए हैं और दस मार्च को यहां तीन टाइगरों को छोड़ा जाएगा। दो टाइगर बांधवगढ़ और एक टाइगर पन्ना नेशनल पार्क से माधव नेशनल पार्क ले जाया जा रहा है। इन तीन टाइगर में से दो फीमेल और एक मेल है।
सिंधिया राजघराने की शिकारगाह था नेशनल पार्क क्षेत्र
आजादी के पहले सिंधिया राजघराने की शिकारगाह शिवपुरी क्षेत्र में थी जिसमें कई वन्य प्राणी पाए जाते थे। करीब 167 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले माधव नेशनल पार्क में माधव सागर व माधव झील भी है। 1982 में नेशनल पार्क के क्षेत्र का विस्तार किया गया और सिंध नदी के आसपास के इलाके को भी शामिल किया गया। आज यह 354 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला नेशनल पार्क हो गया है। यह अवैध रूप से खनन की गतिविधियां भी चलती रहती हैं।
शिकार के दौरान ठहरने के लिए बनी बानखेड़े कोठी
माधव नेशनल पार्क में बानखेड़े कोठी भी है जिसे जार्ज केस्टल के नाम से जाना जाता है। इस कोठी को अंग्रेजों के जार्ज पंचम के भारत प्रवास के लिए बनवाया गया था लेकिन जब वे टाइगर के शिकार पर निकले और उन्हें तुरंत ही टाइगर मिल गया तो शिकार करने के बाद वहां नहीं रुके।




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