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देश की अदालत को सलाम, रात में जागकर दिया फैसला
मुंबई बम धमाकों में ढाई सौ लोगों की जानें गईं जिनमें ज्यादातर बच्चे थे। इन बच्चों के परिवार जान को देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा है और शायद यही वजह रही कि उन्होंने कभी न तो कोई धरना दिया, न ही प्रदर्शन किया। मगर उन्हें उम्मीद थी कि हमारी न्याय व्यवस्था ऐसे लोगों को कभी नहीं छोड़ेगी, चाहे उसमें कितनी भी देरी क्यों न हो जाए।
इन पीड़ित परिवारों का दर्द कानून के जानकारों या मुंबई बम धमाके में दोषी करार दिए गए याकूब मेनन के पक्ष में बयान देने वालों ने न तो देखा है और न कभी उसे जानने का प्रयास किया है। उन्हें चिंता थी तो ढाई सौ लोगों की जान लेने के उस दोषी की कि किसी तरह उसे फांसी से बचा लिया जाए। कानून के जानकारों ने अपनी नींद की परवाह किए बिना अदालत को भी सोने नहीं दिया। फांसी दिए जाने की रात अदालत को खुलवाया और फिर कानूनी दलीलों के बीच फांसी रुकवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
ये लोग यह भी जानते थे कि जब देश की सर्वोच्च न्यायालय एकबार फैसला दे चुकी है तो भी वे बार-बार किसी न किसी बहाने से अदालत के दरवाजे पहुंचे। क्या कभी इन लोगों को बम धमाकों में मारे गए बच्चों व अन्य लोगों के परिजनों की चिंता हुई कि वे उन्हें उनके हक का मुआवजा या अन्य चीजें मुहैया हुईं कि नहीं। क्या कभी उन्होंने उन परिवारों की हालत जानने की कोशिश की कि वे अब किस हाल में हैं। शायद नहीं। तो क्या हमें दोषियों के रक्षा के पहले ऐसे लोगों के बारे में भी नहीं जानना चाहिए। यह तो भला हो कि हमारी न्याय व्यवस्था ने ऐसे पीड़ितों के भरोसे को कायम रखने में पूरा जिम्मेदारी निभाई, नहीं तो ये लोग तो टूट ही जाते। हम हमारी न्याय व्यवस्था को सलाम करते हैं।




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