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एसडीओपी ने अग्रिम जमानत की तस्दीक करने मांगे थे ₹10000, अदालत ने सुनाई सजा
मध्य प्रदेश पुलिस के रिटायर्ड डीएसपी जीपी शर्मा को अदालत ने रिश्वत के एक मामले में सजा सुनाई है। अदालत में रिटायर्ड पुलिस अफसर को 3 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है . शर्मा के खिलाफ एक युवती के अपहरण के आरोपी को कोर्ट द्वारा दी गई अग्रिम जमानत के मामले में आरोपी और उसके पिता द्वारा जमानत की तस्दीक करने के लिए ₹10000 की रिश्वत मांगी गई थी .
घटना घटना के मुताबिक 27 सितंबर 2015 को दमोह के बृजपाल पटेल ने आवेदन दिया था कि एसडीओपी तेंदूखेड़ा जेपी शर्मा द्वारा ₹10000 की रिश्वत की मांग की जा रही है. आवेदक के पुत्र अजय पटेल पर थाना जबेरा में लड़की को भगाकर ले जाने का एस.सी./एस.टी. एक्ट के अंतर्गत अपराध कायम किया गया था, जिसकी विवेचना जी.पी. शर्मा, एस.डी.ओ.पी. तेन्दूखेड़ा कर रहा था, आवेदक ने उक्त अपराध में अपने पुत्र की अग्रिम जमानत दमोह न्यायालय से मंजूर कराई थी,जिसका आदेश लेकर 22 सितंबर 2015 को आवेदक एवं उसका पुत्र अजय पटेल अपने अधिवक्ता के साथ उनके कार्यालय गया था, जो अनावेदक जी.पी. शर्मा एस.डी.ओ.पी. जमानत तस्दीक के लिये 10,000/- रुपये रिश्वत की मांग कर रहे थे। आवेदक रिश्वत नही देना चाहता था, बल्कि उसे रिश्वत लेते हुये रंगे हाथो पकड़वाना चाहता था। उक्त शिकायत का सत्यापन लोकायुक्त पुलिस सागर द्वारा किया गया और 28 सितंबर 2015 को रिश्वत मांग वार्ता रिकॉर्ड की थी जिसमें 29 सितंबर 2015 को आरोपी और आवेदक के मध्य रिश्वत का लेनदेन होना तय हुआ था, जिस पर लोकायुक्त पुलिस द्वारा ट्रैप दल का गठन किया गया और आरोपी एसडीओपी तेंदूखेड़ा के शासकीय आवास में आरोपी को आवेदक से 1000- 1000₹ के 02 नोट एवं 500-500₹ के 06 नोट कुल ₹5000 रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया और समस्त कार्यवाही एवं विवेचना उपरांत अभियोग पत्र माननीय न्यायालय विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988) दमोह के समक्ष प्रस्तुत किया गया। न्यायालय द्वारा प्रकरण के विचारण उपरांत अभियोजन द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजी साक्ष्य एवं मौखिक साक्ष्य व प्रस्तुत न्याय दृष्टांत एवं अभियोजन के तर्कों से सहमत होते हुए माननीय न्यायालय द्वारा आज पारित निर्णय में आरोपी जी पी शर्मा तत्कालीन एसडीओपी तेंदूखेडा को दोषसिद्ध पाते हुए धारा 7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 में 03 वर्ष का सश्रम कारावास एवं ₹20,000 अर्थदंड से दंडित किया गया। न्यायालय द्वारा अभियुक्त क्रमांक 2 विजय कुमार चढ़ार के संदर्भ में अभियोजन मामला प्रमाणित नहीं पाया है फलतः दोषमुक्त किया गया.
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