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इंदिरा गांधी के विश्वस्त आरके धवन का निधन
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विश्वस्त राजेंद्र कुमार धवन जिन्हें आरके धवन के रूप मेें ज्यादा जाना जाता था, का सोमवार को निधन हो गया। वे 1962 से इंदिरा गांधी के निज सचिव थे और कांग्रेस की कार्यसमिति के लंबे समय तक सदस्य व राज्यसभा सदस्य रहे। नरसिंहराव सरकार में वे राज्यमंत्री पद से भी नवाजे गए।इसीलिए 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार ने आपातकाल की ज्यादतियों को लेकर इंदिरा और उनकी कोटरी पर शिकंजा कसा तो इंदिरा गांधी और संजय गांधी के बाद सबसे ज्यादा मुसीबत में धवन ही आए थे। यहां तक कि जो शख्स एक दौर में सरकार का प्रमुख सत्ता केंद्र था, उसे पुलिस की नजरों से बचने के लिए दिल्ली से बाहर भी जाना पड़ा था। राजीव गांधी के कार्यकाल से लेकर सोनिया युग और अब राहुल के जमाने के भी कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं ने अपने राजनीतिक बचपन में धवन की उंगली पकड़कर सियासत की ऊंची इमारत की सीढियां चढ़ी हैं।
धवन 1962 से लेकर 1984 तक इंदिरा गांधी के निजी सचिव रहे। 31 अक्टूबर 1984 को जब उनकी हत्या की गई तब तक वे उनके साथ रहे। आपातकाल में तो धवन की तूती बोलती ही थी, लेकिन जब 1977 में कांग्रेस बुरी तरह हार गई और इंदिरा व संजय के बुरे दिन आए तो कांग्रेस के तमाम वो दिग्गज जिन्होंने आपातकाल में जमकर सत्ता सुख लूटा था और इंदिरा गांधी को ही देश का पर्याय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, इंदिरा और संजय का साथ छोड़ गए। पार्टी का विभाजन करा दिया गया। लेकिन धवन पूरी वफादारी के साथ इंदिरा गांधी के साथ डटे रहे। उनके ऊपर आपातकाल की ज्यादतियों की जांच के लिए बने शाह आयोग में इंदिरा गांधी के खिलाफ सरकारी गवाह बनने का जबर्दस्त दबाव पड़ा, लेकिन धवन न झुके न टूटे। इसीलिए जब इंदिरा की 1980 में सत्ता वापसी हुई तो धवन फिर से उसी तरह ताकतवर हो गए।
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