असद भोपाली की याद में “प्यार बांटते चलो” आयोजित

मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग द्वारा मशहूर शायर एवं गीतकार असद भोपाली के शताब्दी वर्ष पर स्मृति समारोह “प्यार बांटते चलो” 13 सितंबर को रात 8 बजे आयोजित किया गया । कार्यक्रम का लाईव प्रसारण मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के फेसबुक पेज एवं यूट्यूब चैनल पर किया गया।

उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि असद भोपाली का शुमार उन शायरों में होता है जिन्होंने फ़िल्मी दुनिया में अपने बेहतरीन नग़मों से भोपाल का नाम रौशन   किया। इस कार्यक्रम के ज़रिए हमारा उद्देश्य है कि हम युवा पीढ़ी को उनके कारनामों से अवगत कराएं। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ लेखक एवं शायर प्रोफ़ेसर अतीक़ुल्लाह ने कहा कि मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी धन्यवाद की पात्र है कि उसने एक अहम शायर की याद में स्मृति समारोह का आयोजन किया वर्ना सच तो यह है कि हम लोग असद भोपाली को भूलने लगे थे। हमें असद भोपाली और उन सभी शायरों को याद करने की ज़रुरत है जिन्होंने ने भोपाल के मानसिक एवं सांस्कृतिक इतिहास को संग्रहित किया एवं जिन्होंने इस भोपाल को हिन्दुस्तान के नक़्शे में केंद्र बनाने का प्रयास किया। 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध फ़िल्म लेखक एवं निर्देशक रूमी जाफ़री  ने कहा कि आज़ादी के बाद फ़िल्म इंडस्ट्री में उर्दू साहित्य के जो शायर थे और जिन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में भी उर्दू साहित्य के विकास का काम किया उनमें मजरुह सुल्तानपुरी, साहिर, राजा मेहदी अली, कैफ़ी आज़मी, अली सरदार जाफ़री इत्यादि। यह सूची असद भोपाली के बग़ैर पूरी नहीं होती। असद भोपाली ने फ़िल्मी गीतों में भी शायरी की कसौटी को क़ायम रखा। असद भोपाली की जिस ख़ूबी ने मुझे प्रभावित किया वो यह है कि उन्होंने सबसे ज़्यादा म्युज़िक डायरेक्टर्स को ब्रेक दिलवाया। आम तौर पर यह होता है कि म्युज़िक डायरेक्टर्स, गीतकारों को ब्रेक दिलाते हैं मगर असद भोपाली ने इसके विपरीत म्युज़िक डायरेक्टर्स को ब्रेक दिलवाया। 

रशीद अंजुम ने कहा कि असद भोपाली का कारनामा यह है कि उन्होंने 1949 से लेकर 1989 तक 142 फ़िल्मों में लगभग 400 गाने लिखे। उनका लिखा हर गाना पूरी तरह उर्दू शायरी की कसौटी पर पूरा उतरता है। उन्होंने ने लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत के साथ जो गीत लिखा वो आज भी याद किया जाता है। उस गाने के बोल हैं:

हँसता हुआ नूरानी चहरा, काली जुल्फ़ें रंग सुनहरा। 

परवेज़ अख़्तर ने कहा कि असद भोपाली प्रारंभिक रूप से एक प्राकृतिक शायर थे। उन्होंने जिस ज़माने में हौश संभाला वो दौर राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन का दौर था। इसका प्रभाव उस समय के युवाओं पर भी पड़ा मगर असद भोपाली की क़िस्मत अच्छी थी कि उन्हें सरकारी नौकरी मिल गई। इसके साथ उनका शायरी का सफ़र भी जारी रहा और वो मुशायरों में हिस्सा लेने लगे। उन्होंने ने बहुत कम समय में अपनी शायरी से आम जनता के दिल में जगह बनाना शुरू कर दी। फिर उन्हें फ़िल्मी दुनिया से बुलावा आया तो उन्होंने वहाँ भी अपने उम्दा गीतों से अपना विशेष स्थान बना लिया। शायर हसन फतेहपुरी ने काव्यांजलि प्रस्तुत की एवं शोएब अली ख़ान ने असद भोपाली की दो गज़लें प्रस्तुत कीं।

कार्यक्रम के अंत में अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने सभी श्रोताओं का अभिवादन किया। कार्यक्रम का सफल संचालन भी डॉ नुसरत मेहदी ने किया।

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