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‘अवधी’ गायन एवं ‘डण्डा एवं गैर’ लोकनृत्य की प्रस्तुति
एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा सुश्री वंदना मिश्रा एवं साथी अयोध्या का ‘अवधी’ गायन एवं विकास शुक्ला एवं साथी, हरदा द्वारा ‘डण्डा एवं गैर’ लोकनृत्य की प्रस्तुति हुई |
प्रस्तुति की शुरुआत सुश्री वंदना मिश्रा एवं साथियों ‘अवधी’ गायन से हुई, जिसमें सर्व प्रथम देवी गीत जगदम्वा घर में दियना, पश्चात् दीपचंदी ताल- सोहा घर-घर बाजे बधाइयाँ, नेग गीत- कंगनवा हे रानी लेवे तोर, वर माला गीत- झुकि जाओ तनिक रघुवीर, मोसे दगा करे अब हमार नैना, बन्ना गीत- मेरे बन्ने को कोई मत देखो, पीली पगड़िया वाला, विवाह गीत- हठियन सेन्दुरा, विदाई गीत- काहे को ब्याही बिदेश, कजरी अवधी- हरे रामा सावन मां, कजरी मिर्जापुरी- पिया मेंहदी लियादा, सेजिया पे डोले काला नाग, लोकगीत- अगुरी मां डसले पिया, बिरहा- निकलागे निकुलिया गोरखपुर की,होली गीत- औरन महीनवां मा एवं होरी खेलें रखुवीरा आदि गीत प्रस्तुत किये|
मंच पर- तबले पर- श्री पंकज, ऑर्गन पर- राहुल, नाल पर श्री रविश तिवारी एवं पैड पर श्री विपिन वर्मा ने संगत दी|
सुश्री मिश्रा, आकाशकावाणी की ए ग्रेड कलाकार हैं एवं आपने देश-विदेश के विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों पर गायन की सफल प्रस्तुति दी है|
दूसरी प्रस्तुति श्री विकास शुक्ला एवं साथियों द्वारा ‘डण्डा एवं गैर’ लोकनृत्य की हुई-
डण्डा नृत्य-
सावन माह में रक्षाबंधन के बाद भुजरिया पर्व के अवसर पर निमाड़ अंचल के भुआणा क्षेत्र में किया जाता हैं|
नर्तक के दोनों हाथ में सवा-सवा फीट का डंडा होता है। ढोलक, झांझ, मंजीरे की थाप पर डंडो की लय भी पूरे नृत्य गीत को मधुरता प्रदान करती है। श्रीकृष्ण और श्रीराम के भुआणी लोकगीतों का आश्रय लेकर किये जाने वाला यह नृत्य प्रायः कृषक समुदाय का सर्वप्रिय नृत्य है। भुजरिये के अलावा अन्य अवसरों पर भी यह नृत्य देखने को मिलता है।
गैर नृत्य–
निमाड़ अंचल के भुआणा क्षेत्र में राजस्थान से आगत सामुदायिक नृत्य की परम्परा का विस्तार देखने को मिलता है। राजस्थान के गैर नृत्य के समान ही भुआणा क्षेत्र का गैर नृत्य भी है जिसकी गति राजस्थानी गैर नृत्य से अधिक होती है। विषेषकर होली के अवसर पर यह नृत्य किया जाता है, जिसमें कृष्ण भक्ति गीतों को गाया जाता है। नर्तक हाथ में ढाई से तीन फीट के डंडे लेकर नृत्य करते हैं। एक दूसरे के सामने विभिन्न मुद्राओं और पद संचालन के साथ गीत के बोल और ढोल की थाप पर नृत्य करते हैं।
प्रस्तुति में मंच पर- श्री तरुण बाँके, अजीत खोरे, शेखर ताले, गौरव गुर्जर, अर्पित ताले, नारायण खोरे, नरघामे एवं लकी अग्रवाल ने नृत्य में, गायन- श्री विकास शुक्ला का, कोरस- राजकुमार एवं रामनिवास, मंजीरे पर- जगदीश खोटे, ढोलक पर- सोनू काजवे, ढोल पर- रितेश खोरे, एवं घुंगरू पर- हरिश्याम पाटील ने संगत दी |




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