पहले राजनीतिक पार्टियां सदस्यों के छोटे-छोटे सहयोग से चला करती थीं। चुनाव में प्रत्याशी अपने दोस्तों के चंदे से जमा राशि और सहयोग से सांसद-विधायक बना करते थे। मगर आज का समय राजनीतिक दल और उनके नेता बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों, कारोबारियों, व्यापारियों के फंड से चलती हैं या चुनाव में दम-खम लगाते हैं। दल-नेताओं को फंड उपलब्ध कराने वाले परिवार, कारोबारी-व्यापारी सरकारों से उसके बदले बड़े-बड़े काम निकालते हैं लेकिन राजनीतिक फंडिंग का यह खेल कुछ दशकों में ऐसा फला-फूला है कि अधिकांश दल-नेता इसमें डूब गए हैं। आज आयकर विभाग की कार्रवाई का उद्देश्य भी यही है जिससे फंडिंग करने वालों की गतिविधियों पर नियंत्रण पाया जा सके।
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