जनता के विश्वास की रक्षा करना हमारा सर्वोच्च दायित्व है। यह विश्वास ही हमारी शक्ति है और यही हमारी जिम्मेदारी भी। विधायिका के सदस्यों का आचरण, सदन के भीतर और बाहर दोनों ही स्थानों पर, लोकतंत्र की साख से जुड़ा होता है। आज यह आवश्यक है कि हम केवल सिद्धांतों पर चर्चा न करें, बल्कि व्यवहार में भी जवाबदेही को और सुदृढ़ करने के उपायों पर विचार करें। जब एक जनप्रतिनिधि जनता के हित की बात करता है तो लोकतंत्र मजबूत होता है। हमें सोचना होगा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले तत्वों का विधायिका कैसे पालन करे और पालन करवाए। हमारी शक्ति विधायकों सहित लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाले तत्वों के संरक्षण में लगनी चाहिए।
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