रामजन्म और ताड़का वध प्रसंगों का मंचन

एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत  पाँच दिवसीय रामलीला के पहले दिन मुनि आगमन, रामजन्म और ताड़का वध प्रसंगों का मंचन किया गया। इन प्रसंगों में अयोध्या में राजा दशरथ को कोई सन्तान न होने से चिन्तित होना और अपने वंश को लेकर व्यथा व्यक्त करना, मुनि आगमन एवं यज्ञ का परामर्श तथा यज्ञोपरान्त कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी के पुत्रों के रूप में राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म और उसके उल्लास को प्रदर्शित किया गया।

राजा दशरथ को अपने पुत्र प्राणों से भी प्यारे हैं। उनके कुछ बड़े होने पर जब ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आते हैं और राजा दशरथ से राम एवं लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं तो दशरथ विचलित होते हैं। विश्वामित्र के कोप करने पर राजा दशरथ, गुरु वषिष्ठ के समझाने पर साथ भेजते हैं। आज ही के प्रसंग में ऋषि मुनियों के यज्ञों में बाधा डालने वाले राक्षसों और ताड़का का वध भी प्रदर्शित किया गया। 

इस रामलीला का विंध्य अंचल में बहुत प्रभाव है तथा मध्यप्रदेश में पारम्परिक रामलीला के मंचन की यह मण्डली श्रेष्ठ मानी जाती है। खजूरीताल की यह मण्डली महन्त गुरु प्रसन्नदास के मार्गदर्शन में लगातार मंचन कर रही है। लगभग सौ वर्ष पूर्व स्थापित यह मण्डली आरम्भ में महन्त रामभूषण दास जी द्वारा पोषित और प्रोत्साहित रही है जिसका व्यापक प्रभाव रहा। 1953 में अमरपाटन के खजूरीताला स्थित आश्रम में प्रथम वृहद रामलीला का मंचन हुआ। भोपाल में अनेक वर्षों बाद इस मण्डली का आगमन हुआ है। जनजातीय संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच में इस रामलीला प्रदर्शन को खूबसूरत नवाचार और नयनाभिराम दृष्य बिम्बों में प्रस्तुत किया जा रहा है। मंच के अलावा आसपास के स्थानों का भी अनौपचारिक उपयोग कर घटनाक्रम को प्रभावी बनाने का उपक्रम परिष्कार के माध्यम से किया जा रहा है।  

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