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जनजातीय संग्रहालय के ‘लिखन्दरा दीर्घा’ में ‘शलाका 8’ की प्रदर्शनी
मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय के ‘लिखन्दरा दीर्घा’ में भील समुदायकी युवा चित्रकार सुश्री गीता बारिया के चित्रों की प्रदर्शनी ‘शलाका 8’ का प्रदर्शन किया जा रहा है। लिखन्दरा पुस्तकालय के प्रदर्शनी दीर्घा में ‘शलाका 8’ की चित्रकला प्रदर्शनी 30 नवम्बर, 2020 तक रहेगी।
भोपाल में जन्मीं गीता विवाह उपरान्त अपनी चाची सास, भील समुदाय की अग्रणी चित्रकार श्रीमती भूरीबाई के चित्र कर्म से बहुत प्रभावित हुई। गीता ने मन ही मन भूरीबाई की तरह अपने कोभी चित्र कर्म में स्थापित होने का निश्चय किया। चाची सास और चाचा ससुर को काम करते अक्सर देखना, आये दिन उनके काम की प्रशंसा अनेक माध्यमों से जानना-सुनना और भी उत्प्रेरणा का कारण बना। वैसे भी भूरीबाई को चित्र बनाते देखना, किसी गुरूकुल की शिक्षा से कम नहीं था। छुटपन से ही चित्रों, रंगों की तरफ गीता का गहरा आकर्षण तो था ही, किन्तु घर-परिवार की आर्थिक परिस्थितियों के चलते न तो शिक्षा ही हुई और चित्र बनाने का तो अवसर शायद ही कोई मिला हो। पारिवारिक परिस्थितियों के चलते रंगों से खेलने की बचपन की बचपन की उत्कृट इच्छा अचानक विवाह के बाद पुन: जागृत हो उठी और भूरीबाई के रूप में एक गुरू का सान्निध्य गीता ने एक पल के लिए भी खोना उचित नहीं समझा। पूर्ण निष्ठा से इन्होंने अपनी कला गुरू से भीली चित्र परम्पराओं के अभिप्रायों एवं अलंकरण को धीरे-धीरे आत्मसात् करने के प्रयत्न करने आरंभ का दिए। घर के कामों से जैसे ही फुर्सत मिलती, गीता चित्र बनाना प्रारंभ कर देती और तब तक नहीं उठती, जब तक की वो चित्र पूर्ण नहीं होजाता। बहुत बार इस व्यवहार के लिए उलाहना भी झेली, किन्तु इन सब परिस्थितियों से गीता का कलाकार मन विचलित नहीं हुआ और पति का सम्पूर्ण सहयोग भी गीता को मिलता रहा। समय के साथ रंगों का उपयोग, आकारों का संयोजन गीता बखूबी सीख चुकी थी। इनके चित्रों में मुख्यत: पारम्परिक भीली परिवेश एवं जीव-जन्तु की लयात्मकता दिखाई देती है। कोई 11-12 बरस पहले शुरू हुई कलायात्रा आज अनेक संभावनाओं से भरी हुई निरंतरता पा रही है। गीता ने भोपाल, नयी दिल्ली, मुम्बई सहित देश के अनेक शहरों की कला दीर्घाओं,कला मंचों, चित्र शिविरों में अपना सक्रिय योगदान दिया है। अनके शहरों के निजि संग्रहों में इनके अनेक चित्र संग्रहित है।




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