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कर्ज से डूबी सरकार के मंत्री और अफसरों ने चीता स्टडी टूर के नाम पर खर्च किए करीब 35 लाख रुपए
8000 करोड़ रुपए से अधिक की कर्ज में डूबी सरकार के मंत्रियों और अफसरों के बीच फिजूलखर्ची पर कोई रोक नहीं है. पिछले दिनों वन मंत्री विजय शाह, वन बल प्रमुख आरके गुप्ता और एपीसीसीएफ शुभ रंजन सेन को साउथ अफ्रीका और तंजानिया में वाइल्ड लाइफ की स्टडी टूर 3500000 रुपए खर्च हुआ. अब सवाल उठ रहा है कि स्टडी रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
यह खुलासा पर्यावरणविद् और आरटीआई कार्यकर्ता अजय दुबे के आईटीआई से मिले दस्तावेज से हुआ है. 10 दिनों की लंबी अध्ययन दौरे पर राज्य सरकार को 3500000 खर्च करने पड़े., उसी दौरे के लिए अनुमानित राशि से दोगुने से भी अधिक था. दस्तावेज से पता चला है कि कुल खर्च में से 31 लाख 71हजार 500 हवाई टिकट, आवास और स्थानीय यात्रा पर खर्च किए गए. आरटीआई कार्यकर्ता दुबे का कहना है कि हमें आरटीआई से मिले दस्तावेज के बाद वन विभाग से कुछ सवाल हैं, जिनके जवाब न मिलने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समक्ष जांच और मप्र टाइगर फाउंडेशन सोसायटी के स्पेशल ऑडिट कार्यवाही के लिए दस्तावेज रखेंगे. दुबे ने आगे कहा कि इन सबके अलावा या दौरा 20 संदिग्ध है क्योंकि चीजों का स्थानांतरण सीएसआर ( कारपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) के तहत इंडियन आयल फंड के साथ केंद्र प्रायोजित परियोजना थी. सभी महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट (एससी) इस परियोजना की निगरानी कर रहा है. यहां यह बताना उचित है कि जब इस दौरे पर लाखो रुपए खर्च होने थे, तब चीता प्रोजेक्ट के तहत चीतों के 17 सितंबर 22 को कूनो लाने के लिए लिए मप्र सरकार को केंद्र सरकार से राशि और इंडियन ऑयल से सीएसआर फंड नही मिला था. अजय दुबे ने आरोप लगाया है कि वन विभाग के अधीन एमपी टाइगर फाउंडेशन सोसायटी के पैसे खर्च कर बर्बाद हुए. इस यात्रा में परिजन भी उनके साथ थे. उन्होंने कहा कि चूंकि वन मंत्री फाउंडेशन सोसाइटी के अध्यक्ष हैं इसलिए आसानी से पैसे खर्च किए गए. आरटीआई कार्यकर्ता ने सवाल खड़े किए हैं कि जब साउथ अफ्रीका और नामीबिया से चीते लाने के लिए चीता प्रोजेक्ट की नोडल एजेंसी एनटीसीए और राज्य के फॉरेस्ट ऑफिसर पूर्व में वहां लंबे समय रुक कर विदेश दौरे कर चुके थे तो फिर इस दौरे में क्या खास बात थी ?उन्होंने कहा कि तंजानिया से तो चीते लाने की बात भी नहीं है और साउथ अफ्रीका से चीते आज तक नही मिले. मप्र में वनों की कटाई ,अतिक्रमण और वन्य प्राणियों का अनियंत्रित शिकार रोकने की बजाय वनों में पर्यटन बढ़ाने के लिए लाखों रुपए क्यों खर्च किए? पर्यटन बढ़ाने के लिए तो दूसरी तरफ मप्र पर्यटन बोर्ड भी जमकर विदेश दौरे कर रहा है.




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