ब.व. कारंत के रंग-संगीत की प्रस्तुति

एकाग्र ‘गमक’ श्रृंखला अंतर्गत आज उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी द्वारा  आमोद भट्ट, भोपाल द्वारा ‘व्याख्यान’ और ब.व. कारंत के रंगसंगीत की प्रस्तुति दी गई |

प्रस्तुति की शुरुआत कन्नड़ और हिंदी में नाटक हय वदन की- गणपति वंदना से की पश्चात् प्यार के दो बैना (नाटक- घासीराम कोतवाल), चलो कुंज गलिन में (नाटक-होली), आह वेदना मिली विदाई (नाटक- स्कन्द गुप्त), पारसी नर्तकियों का गीत- न न छेड़ना, टुकड़े-टुकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा (नाटक-अँधा युग), हास्य प्रधान गीत- एक चावी से खोल रहा हूँ दो मालिक का ताला (नाटक- दो कस्तियों का सवार), कन्नड़ हास्य गीत- डोंकू वालद नाय कर ( कन्नड़ नाटक- सत्तावर नेरडू) एवं नाटक महानिर्वाण का अंतिम गीत जिसमें भाऊराव का आख्यान- सास चली पंढरपुर को, दो पग चल लौटी घर को गीत से प्रस्तुति को विराम दिया |  

रंगसंगीत के मध्य व्याख्यान में श्री भट्ट ने ब व कारंत के  रंगसंगीत बनाने की प्रक्रिया और नाटकों में उसके उपयोग के बारे में विस्तार पूर्वक बताया | उन्होंने कहा कि – ब व कारंत को परिभाषित करना कुछ मुट्ठी में पानी पकड़ने जैसा प्रयास है | रंग जगत में जो उनकी पहचान थी, तो वो था उनका रंगसंगीत, रूखे से रूखे गद्द को तोड़ कर वह उसमें मीठे संगीत की रस धारा निकाल लेते थे |  

मंच पर – सह गायिका – सुश्री सुभाश्री भट्ट, तबले पर –श्री सुनील भट्ट, ढोलक पर- श्री रविराव, परकशन एवं नरेशन- श्री अनूप जोशी(बंटी) फ्लूट पर- श्री वीरेंद्र कोरे एवं गिटार पर श्री सुयश भट्ट ने संगत दी |  

श्री भट्ट ने संगीत की प्रारंभिक  शिक्षा अपनी माँ सुश्री निर्मला भट्ट से प्राप्त की पश्चात् नाट्य संगीत की शिक्षा ब व कारंत से प्राप्त की | भोपाल से गायन एवं तबला में संगीत प्रभाकर, वर्तमान में आप मुंबई में रंग संगीत निर्देशक के रूप में कार्य कर रहे हैं और संगीत अध्यापन में संलग्न हैं| आपको 2014 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त है |     

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