बेहमई कांड : सामूहिक नरसंहार के 37 साल

बेहमई कांड, वह काला अध्याय जिसने एक नारी के वीभत्स रौद्र रूप को दिखाया। नाम फूलन, काम कांटों से भी ज्यादा दर्द देने वाले। बदले की आग से भरी फूलन ने 14 फरवरी 1981 को अपने साथ हुई तथाकथित ज्यादतियों का ऐसा बदला लिया कि देखने तो सुनने वालों तक के रोंगटे खड़े हो गए। आज भी उनमें से जिंदा लोग जब उस घटना की याद करते हैं उनके शरीर के छिद्रों के बाल तन जाते हैं। उस घटना के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है यह रिपोर्ट।
आज जिसे हम वैलेंटाइन डे के नाम से जानते हैं, तब वैलेंटाइन डे की जगह यह दिन मौत का तांडव खेली फूलन के आतंक के रूप में पहचाना गया। 14 फरवरी का वह दिन जिसने छह माह की एक बच्ची को 15 साल तक घिसटते हुए जीने को विवश कर दिया तो दो भाइयों के मन में वह डर पैदा किया जिससे सोचकर भी उनकी रूह कांपने लगती है।

14 फरवरी 1981  शनिवार को पड़ी थी । कोई गिरोह जब भी यमुना नदी पार करके जालौन या कानपुर की सीमा में प्रवेश करता वह बेहमई से होकर ही जाता। डकैत तमाम प्रकार की जरूरतें भी ग्रामीणों से पूरी किया करते थे। गाँव का दूध – घी तक नही बचता था । लालाराम गिरोह के साथ शुरू में जब कुसुमा नाइन और फूलन देवी शामिल थी , तब यहाँ आना – जाना रहता था । उस वक्त गिरोह के साथ विक्रम मल्लाह भी हुआ करता था । सभी के चेहरे पहचाने जाने लगे थे । बाबू सिंह गूजर की हत्या के बाद जब विक्रम मल्लाह की हत्या की गई तो गिरोहों के बीच जातीय खाई बढ़ गयी। विक्रम को श्रीराम – लालाराम ने मार डाला गया । फूलन के साथ भी कई प्रकार से दुर्व्यवहार हुआ । इसका बदला फूलन देवी हरहाल में लेना चाहती थी । करीब एक वर्ष तक ताकत जुटाई गयी । 14 फरवरी 1981 को वह दिन आ गया । सजातीय होने के कारण लालारम को यहाँ से खाना इत्यादि मिलता रहता था । फूलन को यह अच्छा नही लगता था ।
14 फरवरी 1981 को फूलन देवी का गिरोह पाल -सरेनी की बीहड़ों में ठहरा था । वहीं से बेहमई की हर गतिविधि की टोह ली जा रही थी । यमुना के इस पार पाल-सरेनी और उस पार कानपुर जिले में शामिल बेहमई । ( 1981 में तब कानपुर देहात जनपद नही बना था ) । उस दिन दोपहर जब शाम से मिलने की ओर आगे बढ़ रही थी तो ढाई बजे फूलन देवी अपने साथ मान सिंह , राम अवतार , लल्लू , भीखा , श्याम बाबू सहित करीब 50 डकैतों के साथ बेहमई पहुंची । गिरोह ने पाल – सरेनी से नाव के द्वारा नदी पार की । सबसे पहले प्रभू सिंह और समरथ सिंह के घर जाकर धावा बोला । इन दोनों घरों में ही उस वक्त इकनाली बंदूकें थीं । दोनों हथियारों को कब्जे में ले लिया गया । इसके बाद हर घर को खंगाल कर पुरुषों को खोजा गया । घरों में लूटपाट भी हुई । पुरुषों – युवकों को यह कहते हुए गाँव के बाहर ले जाया गया – ” तुम लोग हैरान होते हो , चलो – तुम लोगों को बताएंगे कि कैसे गिरोह का खाना बंद करना है ‘। ग्रामीणों ने भी सोचा कि डकैत गाँव के बाहर ले जाकर दो – चार डंडे मारकार छोड़ देंगे । घरों में डकैतों के घुसने पर महिलाएं बुरी तरह से डर गयीं थीं । वे डकैतो को सोने – चांदी के जेवर थमा कर पड़ोस के गाँव अनवा, गोरी , खूजा चली गयी ।
24 ग्रामीणों को असलहों के द्वारा धकेलते हुए गाँव के बाहर ले जाया गया । इनमें से तीन लोग अन्य जाति के व बाहरी थे । सभी को घेरे में खड़ा करवाया गया । तब फूलन देवी ने मान सिंह से कहा – ‘ मार दो इन सालों को ” । यह सुनकर मान सिंह ने सबसे पहले गोली चलाई थी । फिर तो तडतड़ की आवाज गूंजने लगी । गोलियां तो फूलन ने भी चलाई थीं । शरीर में गोलियां धँसते ही जिंदा लोग जमीन पर गिरने लगे । 18 लोग मौके पर ही मारे गए । 6 घायल हुए । इनमें 2 ने रास्ते में दम तोड़ दिया । मरने वालों में थे – तुलसीराम (65 वर्ष ), राजेंद्र सिंह (35 ), सुरेन्द्र सिंह (30), जगन्नाथ सिंह (35) , वीरेंद्र सिंह (25 ) , रामाधार सिंह ( 50), शिवराम सिंह ( 40 ) , बनवारी सिंह ( 40 ) , लाल सिंह ( 20 ) , नरेश सिंह ( 22 ) , शिव बालक सिंह ( 40 ) , दशरथ सिंह (30 ) , बनवारी सिंह ( 20 ), हिम्मत सिंह ( 35 ) , हुकुम सिंह ( 30 ) , हरिओम सिंह ( 25 ) के अलावा रामवतार कठेरिया राजपुर ( 16 ) , तुलसीराम कठेरिया राजपुर ( 18 ) , नजीर खाँ सिकंदरा ( 30 ) । इनके अलावा भूरे सिंह , जेंटर सिंह , गुरमुख सिंह और किशन स्वरूप घायल हुए । सभी घायलों को बैलगाड़ी से राजाराम राम सिंह पहले राजपुर अस्पताल ले गए । यहाँ से सभी को पहले कानपुर फिर लखनऊ रेफर कर दिया गया , जिनमें तुलसी राम और नरेश सिंह की रास्ते में मौत हो गयी । गोलिया मारते वक्त डकैत यह कहते जा रहे थे – और खिलाओ लालाराम गिरोह को खाना । वैसे सिर्फ खाना खिलाना ही वजह नही थी बल्कि फूलनदेवी अपने प्रेमी विक्रम को मारे जाने से भी क्रुद्ध थी ।
उस दिन डकैत 2 से ढाई घंटे तक गाँव में रहे थे । खूनी घटना को अंजाम देने के बाद जिस रास्ते आए थे उसी से लौट गए । गाँव में अब सन्नाटा था । पूरी रात शव घटना स्थल पर पड़े रहे । उस वक जो लोग खेतों पर थे , जब उन्होने सुना तो वह भी गाँव लौटने का साहस नही जुटा पाये । 14 फरवरी की पूरी रात 18 शव गाँव में ही पड़े रहे । सुबह जब आस -पास के गांवों में रह रहे रिश्तेदार आए तब उन्होने अपने – अपने शवों की पहचान की । महिलाएं जो घर छोडकर चली गयी थीं , वह जब दोपहर तक लौट पायी , तब तक उनका सुहाग उजड चुका था । शव देखकर वे चीत्कार कर उठीं । पूरा गाँव आंसुओ का समुद्र बन चुका था । तब देश – विदेश तक इस कांड का शोर सुनाई पड़ा था । जब भी 14 फरवरी की डेट आती है , पूरे गाँव में उदासी छा जाती है ।

चंदेल और रोशन ने देखा था यह हादसा

ग्रामीणों पर जब डकैत गोलियां मार रहे तब गाँव के ही राजाराम चंदेल और उनके चचेरे भाई रोशन सिंह अपने जानवरों को लेकर पानी पिलाने नदी ले गए । वे जब घर लौट रहे थे तब दोनों ने देखा कि गाँव के बाहर भीड़ लगी है । पास आने पर फूलन की आवाज सुनने को मिली जो मान सिंह से कह रही थी – मार दो इन सालों को । दोनों भाई तब बेशरम की आड में छिप गए । डकैत सभी पर गोलियां दागने में जुटे थे । यह देख वे घबरा गए । बाद में राम सिंह ही सभी घायलों को लादकर ले गए थे । वह 16 फरवरी को बेहमई लौट पाये । उनके द्वारा ही सिकंदरा थाने में मुकदमा लिखवाया था । राम सिंह बताते हैं कि किस प्रकार फूलन देवी भी गोलियां चला रही थीं ।

छह माह की सरिता 15 वर्षों तक घिसटती रही

डकैत घरों में घुसकर जब जब आदमियों को ढ़ूढ़कर महिलाओं के गहने छीन रहे थे , उसी वक्त छह माह की सरिता सिंह झूले पर सो रही थी । छीना – झपटी में एक डकैत ने उसे जमीन पर पटक दिया था जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गयी थी । 15 वर्षों तक सरिता घिसटती रही । आखिर में उसकी जीनी की हिम्मत टूट गयी।

तुलसीराम का पूरा परिवार तबाह हो गया 

तुलसीराम सिंह के अलावा उनके दोनों बेटे – राजेन्द्र और सुरेन्द्र भी डकैतों के हाथों मारे गए , युवावस्था में ही दोनों की पत्नियाँ विधवा हो गईं । काओ संतान न होने के कारण पुरा परिवार तबाह हो गया । अब तो गाँव में एक मात्र विधवा हरदेई ही रह गईं हैं । जब भी इस संबंध में कोई चर्चा शुरू करता है तो वह रो पड़ती हैं । 35 वर्ष उन्होने बड़ी मुसीबतों में काटे हैं ।

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